नाव वाली चुड़ैल Horror Story | Hindi Horror Stories | Scary Panchal

नाव वाली चुड़ैल Horror Story | Hindi Horror Stories | Scary Panchal

एक बार की बात है एक बाप बेटा जंगल वाले रास्ते से जा रहे थे और बाप बोलता है कि दीपपू जल्दी चलो। नदी किनारा आ गया। नदी की तरफ बिल्कुल भी मत देखना और कुछ भी सुनाई दे ध्यान मत देना। पिताजी नदी का किनारा आने पर इस तरह से क्यों डर गए?

ये दोनों नदी किनारे से गुजर रहे थे।

तभी पानी की आवाज आने लगी। जिसे सुनकर पिता ठिटक सा गया। लेकिन उसने नदी की तरफ नहीं देखा। तभी दीपपू ने नदी की तरफ देखा। एक नाव किनारे की तरफ आ रही थी।

उस नाव पर कौन बैठा था यह नजर नहीं आ रहा था।

जैसे-जैसे वे किनारे पर आई तो दीपू ने देखा वो एक औरत थी जिसका आधा चेहरा घूंघट से ढका हुआ था।

किनारे पर आकर वो रुक गई और हाथ के इशारे से दीपू को बुलाने लगी। पिताजी वो हमें बुला रही है। यह सुनकर पिता बुरी तरह डर गया। मैंने कहा था ना उसकी तरफ मत देखो। अब भागो जल्दी से। ये दोनों अब वहां से तेज-तेज़ भागने लगे।

और वो नाव वाली औरत वहीं खड़ी रह गई।

एक महीने बाद दोपहर का समय था। गांव के लोग अपने-अपने कामों में लगे हुए थे। उसी समय एक जोड़ा टांगे में बैठा गांव में आया।

आइए बाबूजी मधुपुर आ गया। रमेश ने सहारा देकर अपनी बीवी निराजनी को उतारा और वो वहां खड़े मुखिया से मिला। जी क्या आप ही मुखिया जी हैं? हां मैं ही यहां का मुखिया हूं। मुखिया जी ये कौन है? ये मेरे बचपन के दोस्त भानु प्रताप का बेटा रमेश है।

पेशे से लेखक है। बहू गर्भान्य है तो शहर के करीब रहना चाहते हैं।

अब हमारा गांव तो शहर के बहुत करीब है ना इसलिए ये आज से यहीं रहेगा। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया मुखिया जी।

रमेश और निराजनीय एक घर में रहने लगे जो नदी के करीब ही था। रमेश एक अच्छी सी कहानी लिखना चाहता था और अपनी नई कहानी शुरू करने की तैयारी में था। रात के 10:00 बजे मोहिनी और मोहित हाथ थामे टहल रहे थे।

मोहित तुम हमारे रिश्ते की बात अपने बाऊजी से कब कर रहे हो?

अरे करेंगे भाई। अभी पहले बलवीर भैया की शादी तो होने दो। वरना बाबूजी कहेंगे बड़े की शादी नहीं हुई और छोटा फुदक रहा है। नदी किनारे अजीब सी शांति छाई हुई थी।

चलती हवाएं माहौल को सुहाना बना रही थी।

ये दोनों भी बातें करते-करते नदी किनारे पहुंच चुके थे। कितना सुहाना मौसम है ना। हां, नदी भी कितनी खूबसूरत लग रही है।

दोनों नदी किनारे बैठ कर बातें करने लगे। कितना अच्छा होता कि कोई मांझी होता तो हम दोनों उसकी नाव में नदी की सैर कर सकते। हां, बहुत अजीब बात है। कि हमारी नदी में मांझी क्यों नहीं आते? वरना मन तो मेरा भी बहुत करता है।

तभी पानी की कल-कल की आवाज आनी शुरू हुई। दोनों को सामने से वही नाव आती नजर आई जिसके अंदर घूंघट वाली मांझी बैठी थी। अरे वाह ये तो बहुत अच्छा हुआ। वो देखो मांझी आ रही है। मांझी किनारे पर आ गई और उसमें बैठी औरत शांत रही।

काकी क्या आप हमें नदी की सैर करा लाएंगी?

इस पर उसने हां में सिर हिलाया। अरे वाह चलो। दोनों एक-एक करके उसकी नाव में बैठ गए। और फिर उस औरत ने नाव चलाना शुरू किया। धीरे-धीरे नाव आगे बढ़ रही थी। पानी की आवाज बहुत ही मधुर लग रही थी।

और ये दोनों बहुत खुश थे। मोहिनी ने पानी हाथ में उठाकर मोहित पर फेंका। ये लो। अरे तो मोहित ने भी वही क्रिया दोहराई और फिर दोनों हंसने लगे। नाव अब नदी के बीचोंबीच थी।

और वो मांझी बिल्कुल चुपचाप नाव चला रही थी। ये कुछ बोल क्यों नहीं रही है?

जी क्या आप सच में कोई मांझी है

या फिर आप भी हमारी तरह सैर को निकली हैं? ये सुनकर वो औरत तेज-तेज़ चप्पू जलाने लगी। नाव की रफ्तार बढ़ गई और ये दोनों शांत भाव से उसको देखने लगे। तभी हवा चली और उसके चेहरे से घूंघट हट गया।

उसकी चाल चमकती आंखें और भयानक चेहरा जैसे इन दोनों ने देखा तो इनके डर का ठिकाना। मोहिनी उसका चेहरा देख सह गई और बेहोश हो गई।

कुछ देर बाद मोहिनी की आंख खुली तो वह किनारे पर अकेली पड़ी थी। उसने इधर-उधर देखा और खुद को अकेला पाकर घर की तरफ दौड़ पड़ी। मोहिनी अरे तुम कहां गई थी और कहां से आ रही हो इतनी रात में? मोहिनी बहुत डर में थी लेकिन अपने पिता को मोहित के बारे में बता नहीं सकती थी। इसीलिए वह चुप ही रही और उसके पिता ने उसे घर के अंदर भेज दिया। उसको मोहित की चिंता हो रही थी।

शाम होने पर उसको अजीब-अजीब आवाजें सुनाई देने लगी।

जैसे कि कोई मांझी तेज-तेज चप्पू चला रही हो। ये चप्पू की आवाज यहां कैसे आ रही है? उसने खिड़की खोल कर देखा तो उसको अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ।

उसने देखा कि सामने वही औरत नाव के अंदर खड़ी है। उसकी मां उसकी चीख सुनकर वहां पहुंची। क्या हुआ बेटा? मोहिनी ने खिड़की की तरफ इशारा करते फिर से देखा। मां वो लेकिन इस समय खिड़की के बाहर उसका बगीचा नजर आ रहा था।

यह देखकर मोहिनी के मुंह से आगे कुछ नहीं निकला। रात होने पर मोहिनी सोने के लिए बेड पर पहुंची। करीब 1:00 बजे जब वो गहरी नींद में थी।

तभी उसको अपने पैरों पर कुछ गीला महसूस हुआ और उसकी आंख खुल गई। कौन है? लेकिन आंख खुलते ही उसने पाया कि उसका बेड़ नदी के बीच तैर रहा है और वही घूंघट वाली औरत अपनी नाव में बैठी उसकी तरफ आ रही है। ये सब क्या है? मेरे साथ क्या हो रहा है?

क्यों मेरा पीछा कर रही हो? तभी उसे किसी ने हिलाया। तो वो अपने सेंस में आई।

उसने पाया कि वो अपने कमरे में ही है और उसके मां-बाप उसके पास ही हैं। क्या हुआ बेटा? तुम इतनी अजीब बर्ताव क्यों कर रही हो?

मोहिनी कस के अपनी मां के गले लग गई और फिर उसने अपने माता-पिता को सब कुछ बता दिया। ये क्या किया तुमने? अरे नदी पर गई और उस मांझी के नाव में भी बैठी और यह सब आप बता रही हो। पिताजी मैं वहां मोहित के साथ गई थी।

इसलिए डर की वजह से आपको बताया नहीं। आप उसे पसंद कहां करते हैं? यह सुनकर मोहिनी के पिता ने उसकी मां की तरफ देखा और मोहिनी को आश्वासन दिया। वो मोहिनी का खास ध्यान रखने लगे।

लेकिन मोहिनी को हर जगह वो मांझी दिखाई देती।

मोहिनी ऐसे में मोहित को बहुत याद कर रही थी। और इससे तंग आकर उसने फैसला किया कि वो उस औरत से जाकर मिलेगी और मोहित से उसके बारे में पता करेगी। रात 12:00 बजे वो नदी पर पहुंची तो सामने उसको नदी किनारे वही औरत खड़ी नजर आई। तुम क्यों मेरे पीछे पड़ी हो और मेरा मोहित कहां है? क्या किया तुमने उसके साथ?

आओ मेरे साथ आओ। मैं तुमको उससे मिला दूंगी। मोहिनी उसके कहने पर वापस मांझी में बैठ गई। और फिर उस औरत ने नाव चलाना शुरू किया। जैसे-जैसे औरत आगे बढ़ रही थी। मोहिनी के दिल की धड़कन भी बढ़ती जा रही थी। कुछ देर चलने के बाद नाव एक टापू पर आकर लगी। यही है तुम्हारा मोहित। क्या तुमने मोहित को इस टापू पर छोड़ा है? ये सुनकर उस औरत ने यहां में से हिलाया। मोहिनी उसकी नाव से उतरी और आगे बढ़ गई।

टापू बहुत सुनसान था और वीरान भी। मोहिनी एक डर के साथ आगे कदम बढ़ा रही थी। ये मुझे यहां क्यों छोड़ गई? मोहित मोहित क्या तुम यहां हो? वो बार-बार आवाज लगाती है। लेकिन उसे कोई जवाब सुनाई नहीं दे रहा था। तभी अचानक उसका पैर किसी चीज से टकराया। और वो जमीन पर गिर गई। उसने पाया कि मोहित जमीन पर मृत हालत में पड़ा है।

मोहिनी अब चीखती चिल्लाती वहां से वापस नदी की तरफ भाग रही।

तभी वही नाव वाली औरत अचानक से उसके सामने आ गई और भयानक अंदाज में बहुत जोर से चिल्ला रही। अगले दिन मोहिनी के गायब होने की खबर गांव में बुरी तरह फैल गई थी। मुखिया जी, कुछ गांव वाले और रमेश भी वहां मौजूद थे। इस मांझी का शिकार अभी तक कितने लोग हो चुके हैं? पता नहीं हमें उससे कब छुटकारा मिलेगा। मुखिया जी ये किस मांझी की बात कर रहे हैं? आप मुझे बताइए। रमेश उस नदी के किनारे एक औरत एक मांझी है।

रात के समय पर नजर आती है

और कोई गलती से भी उसकी नाव में बैठ जाता है तो वो गायब हो जाता है या कुछ ही दिनों में उसकी मौत हो जाती है। लेकिन ऐसा क्यों? कौन है वो मांझी? और वो ऐसा क्यों कर रही है? कई सालों पहले नदी पर बहुत से मांझी रहा करते थे।

सभी मांझी नाव में बैठाकर यात्रियों को दूसरे छोर पर छोड़कर आते थे। उन्हीं मांझियों में एक था किशन। किशन की बीमारी के चलते मौत हो गई थी और उसकी मौत के बाद उसकी पत्नी मंजरी बेसहारा हो गई थी। इसीलिए एक दिन वो किशन की नाव लिए नदी पर पहुंची। ये क्या कर रही है मंजरी? तू इस नदी में मांझी नहीं बन सकती। इस पर सिर्फ हम मर्द अपनी नाव चलाते हैं। औरत का काम करना गांव का और हम मर्दों का अपमान है।

मुझे इस समय धन की जरूरत है और यह मेरे पति की नाव है।

मैं इसे क्यों नहीं चला सकती? बावली हो गई है के। तन्ने पता ना कि औरत का काम करना ठीक ना से। उसे गैर मर्द गंदी नजरों से देखे से। हां। अगर मर्द गंदी नज़रों से देखते हैं तो उनको अपनी नज़र ठीक करनी चाहिए। उसमें मेरी कोई गलती नहीं। रही बात काम करने की तो मैं भीख मांगकर अपना घर नहीं चलाने वाली। मैं इस नदी में भी अपनी नाव चलाने की हकदार हूं और मैं भी एक मांझी बन सकती हूं। ये सुनकर बाकी सभी मांझी अपने दांत भीचने लगे। सभी ने मिलकर योजना बनाई और जो भी यात्री नदी किनारे आता वो मंजरी की नाव में उसे बैठने ना देते। आइए भाई साहब आपको उस पार जाना है। मैं छोड़ दूंगी सिर्फ चार आने में। तभी बलबीर आगे आकर बोला अरे हमारा धंधा को खराब करना चाहती है क्या? उस पर जाने के छह आने लगते हैं

और तू हमारा ग्राहक छीन के चार आने में ले जाएगी। इसी तरह वो सही दाम लगाने पर भी मंजरी के यात्री छीन लिया करते थे।

एक रात मंजरी अपनी नाव में सवार नदी किनारे बैठी थी। और उसी समय एक मांझी अपनी नाव के साथ वहां मौजूद था जिसने अपना चेहरा गमछे से छिपाया हुआ था। एक आदमी अपने छोटे भाई के साथ नदी किनारे पहुंचा।

उसका छोटा भाई का सर फटा था और उसको गंभीर चोट आई थी। भाई साहब मेरे भाई को जल्द ही वैद जी के पास ले जाना होगा। वरना इसकी मौत हो जाएगी। आइए भाई साहब मेरी नाव में आइए। अरे चपकार भाई साहब आप मेरी नाव में आओ मैं जल्दी पहुंचा दूंगा शुक्रिया भाई लेकिन मेरे पास पैसे नहीं है मैं कल आपको दे दूंगा अरे ये क्या कह रहे हो पैसे नहीं है

तो हम लेकर भी नहीं जाने वाले पहले पैसे लेकर आओ। उस मां जी ने गंभीर हालत में देखते हुए भी उसको ले जाने से इंकार कर दिया। भाई साहब आप मेरी नाव में बैठ जाइए। मैं आपको छोड़ देती हूं। आप पैसे मत देना। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया बहन। वो आदमी अपने भाई को मंजरी की नाव में बैठाने ही वाला था कि तभी बस बहुत हुआ इस मंजरी का। अब हम इसकी मनमानी नहीं चलने देंगे। यह हमारा धंधा चौपट करके ही मानेगी। अगर तुमको बिना पैसों के नहीं जाना तो मुझे इसे ले जाने दो। बेचारा कितने दर्द में है।

आपको दिखता नहीं। इसको जल्दी ही डैड के पास नहीं ले जाया गया तो इसकी मौत हो जाएगी। हां दिख रहा है लेकिन हम तुझे फ्री में नहीं ले जाने देंगे। मैं इसे आज बैग तक पहुंचा कर रहूंगी। ये सुनकर उस मांझी को गुस्सा आ गया। ये तो बहुत बुरा हुआ मुखिया जी।

फिर आगे क्या हुआ?

अगली रात से मंजरी अपनी नावों के साथ नदी किनारे नजर आने लगी और उसने सभी मांझियों के दिल में डर का माहौल बना दिया।

मांझियों को वो अपनी कहानी बताती और उन पर जानलेवा हमला भी करती। इसलिए सभी मांझियों ने नदी में नाव चलाना छोड़ दिया। रोजाना रात के समय सिर्फ मंजरी की नाव ही नदी में नजर आती और वो जो भी उसकी नाव में बैठ जाता वो या तो नाव गायब हो जाता या फिर मर जाता। रमेश को मंजरी की दास्तान बहुत दुख भरी लगी।

वो एक लेखक था। इसीलिए वो मंजरी के बारे में बहुत ज्यादा सोचने लगा और उसी के बारे में उसने लिखना भी शुरू किया। कुछ दिन ऐसे ही गुजर गए। एक रात निराजिनी को लेबर पेन शुरू हुआ। जल्दी से वैद को बुला कर लाइए। मैं अभी किसी को बुला कर लाता हूं। रमेश मुखिया के घर पहुंचा तो वहां हवेली के बाहर ही एक आदमी बैठा हुआ था। बिरजू काका वो मुखिया जी कहां है? बेटा मुखिया जी तो किसी काम से पास ही के गांव गए हैं। दो दिनों में वापस आएंगे। मुझे मदद की बहुत जरूरत है। निराजिनी को दर्द शुरू हो गया है।

मुझे इस समय किसी वैद के पास जाना होगा जिसके पास दाई मां भी हो। बेटा गांव में कोई वैद या दाई मां नहीं है। तुमको महीनपुर गांव में ही वैद जी और दाई मां मिल सकती है। लेकिन वहां जाने के लिए अभी तुमको कोई टांगा नहीं मिलेगा। और नदी के जरिए तुम वहां जा नहीं सकते। सुबह से टांगे चलना शुरू होंगे तो तभी कुछ हो सकता है।

नहीं सुबह तक भला मैं कैसे रुक सकता हूं।

मेरी बीवी कभी भी मां बन सकती है। बेटा रुकना तो पड़ेगा। बताओ कैसे जाओगे? मुझे नहीं लगता कि इस समय कोई टांगे वाला तुमको वहां मिलेगा। रमेश निराजनी को लेकर सरहद पर रवाना हो गया। जहां एक तरफ नदी थी और उसके ऊपर पुल जा रहा था। उसने देखा कि पुल काफी ऊंचाई पर है और वहां कोई भी टांगा नहीं है।

क्या करूं? अब तुमको कैसे लेकर जाऊं मैं? तभी नाव के पतवार और चंपू की आवाज सुनाई दी। उसने देखा कि नदी किनारे नाव लेकर मंजरी आ रही है।

उसे देखकर एक पल को रमेश संट रह गया। लेकिन तभी निराजनी रमेश को अब कुछ समझ नहीं आया। और उसने निराजिनी को उठाया। संभल कर निराजिनी। उसने निराजिनी को मांझी की नाव में बिठाया। हमें अगले छोर पर जाना है।

महिमपुर गांव। मेरी बीवी को वैद जी और दाई मां की सख्त जरूरत है। यह सुनकर मांझी ने नाव चलाना शुरू किया। आधी रात के समय किसी के साथ नाव में सफर करना यह जानते हुए भी कि वो एक आत्मा है। यह बहुत ही डरावनी बात थी।

लेकिन आज रमेश ने ठान लिया था कि वो अपने होने वाले बच्चे और निराजनी की जान बचाकर रहेगा। ना वो धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। निराजिनी बहुत दर्द में थी और वो मंजरी के बारे में नहीं जानती थी। इसलिए उसका पूरा ध्यान अपने दर्द पर था। पता नहीं आज मैं जिंदा बचूंगा या नहीं। पता नहीं ये आत्मा हमें सही सलामत वहां महिमपुर छोड़ेगी भी या नहीं। सामने कुछ ही दूरी पर अब इन दोनों को किनारा नजर आ रहा था।

रमेश को इस बात की खुशी थी

कि अभी तक मंजरी ने उसके साथ कुछ गलत नहीं किया। यह देखकर रमेश को थोड़ी राहत मिली। आप इतनी देर में क्यों नाव चला रही हैं? मुझे दर्द हो रहा है। जल्दी कीजिए ना। ये सुनकर मंजरी को गुस्सा आ गया और वो तेज-तेज़ चप्पू चलाने लगी।

क्या हुआ रमेश? इस तरह क्यों बर्ताव कर रही है? तभी मुंजरी के चेहरे से घूंघट हट गया और इन दोनों ने उसका भयानक चेहरा देखा। अगले दिन गांव में मातम सा माहौल छा गया। सभी लोग रमेश और निराजनी के बारे में अफसोस जता रहे थे।

काका तुमने रमेश को रात में नदी पर क्यों जाने दिया?

राम राम। अरे मैंने कहा था रमेश से कि इस समय वहां जाना ठीक नहीं लेकिन उसने मेरी एक ना सुनी। अब तो रमेश भी गायब हो गया।

मैं भला अपने दोस्त को क्या जवाब दूंगा? अब मंजरी भी नदी किनारे नजर नहीं आती थी। तीन दिन बाद एक टांगा गांव पहुंचा। जिसके अंदर से रमेश और निराजिनी को उतरता देख सभी हैरान रह गए। अरे रमेश तुम तुम जिंदा कैसे बच गए? रमेश और निराजनी को उसके बच्चे के साथ सही सलामत देखकर सभी खुश थे।

लेकिन ताज्जुब भी थे कि मंजरी की आत्मा ने उनको कैसे छोड़ दिया। मुखिया जी मैं एक लेखक हूं। और मैं जानता हूं कि हर आत्मा तब तक ही भटकती है

जब तक उसकी आखिरी ख्वाहिश पूरी नहीं हो जाती। मंजरी की आखिरी ख्वाहिश थी उस आदमी को वैद के पास छोड़कर आना और जब मैं निराजनी को लेकर उसकी नाव पर पहुंचा तो उसको निराजनी में वही इंसान दिखाई दिया।

उसने हमें उस पार पहुंचाया और इस तरफ उसकी आखिरी ख्वाहिश पूरी हो गई। अब मंजरी नदी पर कभी नजर नहीं आएगी। यह सुनकर सभी गांव के लोग खुश हुए और गांव का एक आदमी बलबीर भी बहुत खुश था। रात के समय बलबीर ने अपनी नाव पानी में उतारी। उस मंजरी को मारने के बाद इतने सालों बाद नदी में नाव उतारी है।

आज तो पूरी रात नदी में घूमता रहूंगा। बलबीर तेज-तेज़ चप्पू चलाने लगा और नाव आगे बढ़ने लगी। तभी सामने से उसको मंजरी की नाव आती नजर आई।

और उसके चेहरे से हंसी गायब हुई। ख्वाब में बदल गई। तू तू वापस वापस कैसे आ गई? मुझे मारने वाला तो तू ही था ना बलबीर। तुझे मारे बिना भला मेरी आत्मा को शांति कैसे मिल सकती थी? ये कहकर मुझे उस पर दूर पड़ी और बलबीर अपनी नाव समेत पानी के अंदर समा गया।


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